कोयले का अंगार देखा है..
कैसे तिनका तिनका जलके राख होता है|
उसकी राख उस से लिपट कर,
उसे ही भुझाने लगती है..
उसका अपना ही कुछ,
उसकी घुटन बन जाता है..
उसे इंतज़ार है हवा के एक झोंके का..
कोयले का अंगार देखा है..
कभी भडकता, कभी घुटता ..
उम्र भर जलकर, उसे राख ही तो होना है|
कोयले का अंगार देखा है..
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गहरी बात..उम्दा रचना!
आप एवं आपके परिवार को होली मुबारक.
-समीर लाल ’समीर’