तारीफ़ ए ग़ज़ल


लफ़्ज़ों के नक़ाब से गम छुपा लिया करते हैं,
तारीफ़ ए ग़ज़ल पर हम मुस्कुरा लिया करते हैं|

जब ख़ामोशी खटखटाती है तन्हाई का दरवाज़ा,
अपनी ग़ज़लों को हम गुनगुना लिया करते हैं|
तारीफ़ ए ग़ज़ल पर हम मुस्कुरा लिया करते हैं…

कभी दिल मचल के कहने लगता है हाल अपना,
तब एक साँस में हम कुछ बुदबुदा लिया करते हैं|
तारीफ़ ए ग़ज़ल पर हम मुस्कुरा लिया करते हैं…

रात जब वीरानो में ढूँढती फिरती है नींद को,
हम तेरी यादों से ज़हन सजा लिया करते हैं|
तारीफ़ ए ग़ज़ल पर हम मुस्कुरा लिया करते हैं…

हकीक़त जब अपने थपेडों से अक्स धुंधलाती है,
आँखों में हम तस्वीर तेरी बना लिया करते हैं|
तारीफ़ ए ग़ज़ल पर हम मुस्कुरा लिया करते हैं…

सूख जाता है ज़हन जब खलिश की आग से,
तेरी याद में हम कुछ अश्क बहा लिया करते हैं|
तारीफ़ ए ग़ज़ल पर हम मुस्कुरा लिया करते हैं…

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3 Responses

  1. bahut sundar gazxal he aap ki ye

    shekhar kumawat

  2. हकीक़त जब अपने थपेडों से अक्स धुंधलाती है,
    आँखों में हम तस्वीर तेरी बना लिया करते हैं|
    तारीफ़ ए ग़ज़ल पर हम मुस्कुरा लिया करते हैं…

    Prem ki gahari manodasha ka sundar chitran…
    Bahut shubhkamnayne

  3. लफ़्ज़ों के नक़ाब से गम छुपा लिया करते हैं,
    तारीफ़ ए ग़ज़ल पर हम मुस्कुरा लिया करते हैं

    आप आप मुस्कुराते हुए अच्छे लगते हैं :)

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