हम ढूँढ़ते हैं

कहाँ चले गए वो कारवां लेकर,
हम रेत पे पैरों की निशां ढूँढ़ते हैं|

सब मशरूफ़ हैं अपनी तलाश में,
हम एक हमदर्द इंसा ढूँढ़ते हैं|

मिलते हैं कितनों से हर दिन,
खुद से मिलने का समां ढूँढ़ते हैं|

है सुकून तेरे ज़हन में ही,
हम इसे कहाँ कहाँ ढूँढ़ते हैं|

मजबूरी है या हौसला इनका,
जहां उम्मीद नहीं,
उम्मीद वहाँ ढूँढ़ते हैं|

जो जज़्बात ना कर सके बयां,
मेरी गज़लों में जुबां ढूँढ़ते हैं|

दीवानापन नहीं तो क्या है ‘वीर’,
लोग वीरानों में सपनों का जहाँ ढूँढ़ते हैं|

नम आँखों से गुज़र जायेगी

सूखे पत्तों सी आई है याद,
नम आँखों से गुज़र जायेगी|

यूँ तो ख़ामोशी है इनकी अदा,
बहते बहते ये कहानी बन जायेगी|
नम आँखों से गुज़र जायेगी|

खलिश है बीते कल की ये,
वरना बीती रुत कब आयेगी|
नम आँखों से गुज़र जायेगी|

सदमों से खत्म नहीं होती जिंदिगी,
संभालते संभालते संभल जायेगी|
नम आँखों से गुज़र जायेगी|

है उम्र मुठी में रेत जैसे,
देखते देखते फिसल जायेगी|
नम आँखों से गुज़र जायेगी|

कुछ धीमी सी है आहट इसकी,
आते आते मौत आयेगी|
नम आँखों से गुज़र जायेगी|

बहुत दाना है जिंदिगी दोस्त,
हर कदम पे ख्वाब नया दिखायेगी|
नम आँखों से गुज़र जायेगी|

कुछ रहता नहीं यहाँ रुक कर,
पल में तस्वीर बदल जायेगी|
नम आँखों से गुज़र जायेगी|

इतनी बिखरी है जिंदिगी मगर,
एक साँस में सिमट जायेगी|
नम आँखों से गुज़र जायेगी|

मुन्तज़िर कब तलक रहेगा ‘वीर’,
आरजू और कितना सतायेगी|
नम आँखों से गुज़र जायेगी|

फासले खुद से खुद के

फासले खुद से खुद के, मिटाए ना गए,
झूट खुद से खुद के, भुलाये ना गए|

तामीर किया था बड़ी शिददत से इसे,
घर खुद से खुद के, जलाये ना गए|

खोकले उसूलों ने छुपा दिया आइना,
राज़ खुद से खुद के, बताये ना गए|

सुलझी जिंदिगी कुछ उलझी इस तरह,
तार खुद से खुद के, सुलझाए ना गए|

हालात को बना के मुजरिम वफ़ा का,
वादे खुद से खुद के, निभाए ना गए|

यूँ मशरूफ रहा उम्र भर दुनिया में,
रिश्ते खुद से खुद के, बनाए ना गए|

बेबसी की चादर ओढ़ रखी है,
कुसूर खुद से खुद के, उठाये ना गए|

बरसों इन चिरागों से रोशन थी राहें ‘वीर’,
ख्वाब खुद से खुद के, भुजाए ना गए|

आपने फ़र्ज़ निभाया है

आपने फ़र्ज़ निभाया है,
हम पे क़र्ज़ चढ़ाया है|

कभी थोडा कर भी लेते,
क्यों सिर्फ प्यार जताया है|
हम पे क़र्ज़ चढ़ाया है|

बार बार जताकर अहसानों को,
आपने हमारा सर झुकाया है|
हम पे क़र्ज़ चढ़ाया है|

हारेगा तू ही इस रंजिश में ‘वीर’,
किसने लकीरों को मिटाया है|
हम पे क़र्ज़ चढ़ाया है|

मुझे बदलना होगा

मैं जैसा हूँ उनको गवारा नहीं,
मुझे बदलना होगा|

अपनी शक्सियत मिटा के,
वैसा बनना होगा|
मुझे बदलना होगा|

पहचान ना आये अक्स आईने में,
ऐसा नक़ाब पहनना होगा|
मुझे बदलना होगा|

उससे भाग के जाऊँगा कहाँ,
उसी दामन में समाना होगा|
मुझे बदलना होगा|

कोई बिखेर दे तुझे हवा में ‘वीर’,
तू ज़र्रा ज़र्रा धुआं होगा|
मुझे बदलना होगा|

मेरे गम मेरे ही रहेंगे

किससे क्या कहें, किससे क्या कहेंगे,
मेरे गम मेरे ही रहेंगे|

कांटे हैं ये ज़हन के बाग के,
हम इन्हें मोतियों से पिरोइंगे|
मेरे गम मेरे ही रहेंगे|

हमदर्दी नहीं हैं चारा इनका,
दोस्त हमें और क्या देंगे|
मेरे गम मेरे ही रहेंगे|

चलते जाना मजबूरी है या फितरत,
सहा है, युहीं और सहेंगे|
मेरे गम मेरे ही रहेंगे|

आज हूँ कल ना होगा मैं,
मेरी जीस्त के फ़साने बनेंगे|
मेरे गम मेरे ही रहेंगे|

उनको और कोई रोज़गार नहीं,
अभी मुझे और बरबाद करेंगे|
मेरे गम मेरे ही रहेंगे|

बेखुदी में, मैं ही बिछड़ गया,
कारवां आगे और बढेंगे|
मेरे गम मेरे ही रहेंगे|

सुनते है वक्त भर देता है ज़क्म,
जहाँ गुजरे इतने साल, और गुजरेंगे|
मेरे गम मेरे ही रहेंगे|

लिपट के रोया उसके दामन में,
इस मरासिम को क्या कहेंगे|
मेरे गम मेरे ही रहेंगे|

अश्क हमराज़ हैं तेरे ‘वीर’,
बेज़ुबां, वो खामोश ही रहंगे|
मेरे गम मेरे ही रहेंगे|

एक कमी है अनजानी सी

जिंदिगी लगती है कहानी सी,
एक कमी है, अनजानी सी|

काटती है पत्थर सालों से,
उम्र बहती है, पानी सी|
एक कमी है, अनजानी सी|

कुछ आशना है उस अजनबी से,
सूरत लगती है, पहचानी सी|
एक कमी है, अनजानी सी|

भूल जाता हूँ मिलके उससे,
क्या बात है, बतानी सी|
एक कमी है, अनजानी सी|

जो चाहा सब है हासिल,
ज़हन में क्यों है, वीरानी सी|
एक कमी है, अनजानी सी|

पहचान में नहीं आता अक्स,
तस्वीर लगती है, पुरानी सी|
एक कमी है, अनजानी सी|

बेफिक्र बेहिसाब आवारगी,
रुत लगती है, जवानी सी|
एक कमी है, अनजानी सी|

सिला प्यार का प्यार ही मिले ‘वीर’,
उम्मीद लगती है, बेमानी सी|
एक कमी है, अनजानी सी|

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