तन्हा जाम


एक हम ही नहीं अकेले, तेरे महखाने में साकी,
महफ़िल में आज, कुछ तन्हा जाम भी थे|

मंजिल पे खड़े सोच रहा हूँ,
सफ़र में, कुछ इससे हंसीं मकाम भी थे|

मेरे जूनून को समझ कौन पाता,
यारों में कुछ संगदिल, तो कुछ अकल के गुलाम भी थे|

यूं तो ज़माने से अच्छी दोस्ती है हमारी,
मुस्कुराती खामोशियों में कुछ इलज़ाम भी थे|

हाकिम है जो मेरे गुनाहों के,
कुछ साल पहले, वो हमसे बदनाम भी थे|

उसके घर का पता किस्से पूछते ‘वीर‘,
शहर में उनके कुछ आशिक गुमनाम भी थे|

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2 Responses

  1. मंजिल पे खड़े सोच रहा हूँ,
    सफ़र में, कुछ इससे हंसीं मकाम भी थे…

    बेहतर….

  2. सुन्दर भाव !

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