ज़िन्दगी


बातों ही बातों में, कट गयी ज़िन्दगी मेरी,
कितने रिश्तों में, बट गयी ज़िन्दगी मेरी|

अपनी सुध थी न ज़माने की खबर,
इश्क के बाज़ार में लुट गयी ज़िन्दगी मेरी|

कुछ वक़्त का तकाज़ा था, कुछ हालात की मजबूरी,
हर रोज़ बदल गयी, शक्सियत मेरी|

तुझे अपना कहूं तो किस हक से ‘वीर’,
तेरी साँसों ने छीन ली ज़िन्दगी मेरी|

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2 Responses

  1. `हर रोज बदलती गई शख्सियत मेरी’

    क्षमा के साथ एक सुझाव है क्या यह पंक्ति ऐसे लिख सकते हैं सिर्फ `बदल’ को `बदलती’ किया है अन्यथा न लें यह एक सुझाव भर है….

    • आपके सुझाव के लिए धन्यवाद|
      बदलती सही लफ्ज़ है क्योंकि इससे एक निरंतर बदलाव का पता चलता है!

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