क्या था… क्या न था


चली थी मुझ तक, यूँ तो कुछ तेज हवाएं,
पर उस ज़र्रे को मेरा दामन, गवारा नहीं था|

सदाओं पे उस अजनबी ने पलट कर देखा,
जिसे हमने कभी पुकारा भी नहीं था|

उनकी आवाज़ की कशिश बता रही है,
वो जो अपना था, अब हमारा नहीं था|

जिस शक्स को अपने सहारा दिया,
दुनिया में वो अकेला बेचारा नहीं था|

तुमने ही जिंदिगी, तन्हा बीता दी ‘वीर’,
वरना इस जहाँ में, कौन तुम्हारा नहीं था|

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One Response

  1. सुन्दर प्रयास

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