उसके लिए


चला था एक मंज़र लिए,
नज़र में एक चेहरा लिए|

किसको खबर थी, डूबी कश्ती की,
चले थे सब, मौज-ऐ-सेहरा लिए|

आज शाम बैठा सोचता हूँ,
निकलेगा कल सूरज किसके लिए|

वीर,
ख़तम हो जाये ये दास्ताँ तो अच्छा है,
थक गया हूँ, अपने कांधे पे ज़माने लिए|

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One Response

  1. ख़तम हो जाये ये दास्ताँ तो अच्छा है,
    थक गया हूँ, अपने कांधे पे ज़माने लिए|

    …….उत्तम

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