किसी की


सुना जो हाल मेरा, जुबानी किसी की,
दिल्लगी बन गयी, पशेमानी किसी की|

दीवाना ढूँढता है इस क़दर तुझे,
आवारगी बन गयी, जवानी किसी की|

बदली जो फितरत, इश्क में हमारी,
बेखुदी बन गयी, हैरानी किसी की|

वो मेरा सोज़ था या उसकी अदा,
सज़ा बन गयी, नादानी किसी की|

खोकला कर गयी उसकी रुसवाई मुझे,
ये क्या दे गयी, बे-ईमानी किसी की|

वफ़ा जो निभाई उम्र भर मैंने,
मतलब बन गयी, कुर्बानी किसी की|

जीते रहने के सिवा चारा नहीं था,
मजबूरी बन गयी, रवानी किसी की|

तनहाइयों ने ही गले लगाया हमको,
आशियाना बन गयी, वीरानी किसी की|

सुना रहा था हाल-ऐ-दिल ‘वीर’,
ग़ज़ल बन गयी, कहानी किसी की|

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