थोडा और बहकने दो


साकी का सब्र अभी टूटा नहीं,
हमें थोडा और बहकने दो|

मुरझाये गुल की ख्वाइश है,
हमें थोडा और महकने दो|

बुझाओ न चिंगारी मेरे वजूद की,
हमें थोडा और भड़कने दो|

कब तलक संभालेंगे इनको,
हमें थोडा और बरसने दो|

निकल जाऊंगा पहरे मोहब्बत से,
हमें थोडा और फसने दो|

संभल जायेगा तू फिर से ‘वीर’,
उन्हें थोडा और सवारने दो|

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