दर्द ये एक गुमनाम सा है

ये वक्त इम्तेहान का है,
इश्क के अंजाम का है|

हो फना उसकी चाहत में,
इरादा इन्तेकाम का है|

उसकी है कोई मजबूरी,
ख़ामोशी में पयाम सा है|

चल किसी नए शहर जहाँ,
नाम अपना गुमनाम सा है|

देर तलक तन्हा सोचना,
रोज़गार हर शाम का है|

घर तो कभी था ही नहीं,
सिर्फ पता मकान का है|

नयी नहीं है कहानी मेरी,
किस्सा ये आम सा है|

किसका ज़मीर है पूरा साफ,
हर कोई थोडा बदनाम सा है|

कोई ख्वाब नहीं बाकी,
जिस्म ये बेजान सा है|

ऐसे ही जिंदा रहना पड़ेगा,
क़र्ज़ उनके अहसान का है|

है जिंदिगी नहीं ये आखरी,
बस नाम एक मकाम का है|

उड़ते नहीं बादलों से ख्याल,
दिल बंद आसमान सा है|

काश होता कोई लफ्ज़ ‘वीर’,
दर्द ये एक गुमनाम सा है|

थक गया हूँ

अब और कितनी दूर है मंजिल,
भागते भागते मैं थक गया हूँ|

दिल लगता नहीं है किसी में,
मौत से पहले मैं मर गया हूँ|

किसकी तलाश है, कैसी तलाश है,
अपनी आवारगी से डर गया हूँ|

क्या हूँ मैं, कौन हूँ मैं,
रोज सवालों को लेकर घर गया हूँ|

सब कुछ तो है कल जैसा ही,
शायद मैं ही बदल गया हूँ|

हमसफ़र है तू या कोई मुसाफ़िर,
तेरी रहगुज़र में मैं पड गया हूँ|

काश समझ पाता मेरी कशमकश को,
जिसके लिए में ज़माने से लड़ गया हूँ|

अनजान हूँ अपने मुकद्दर से,
हासिल सब जिसके लिए मैं लग गया हूँ|

है ज़हर तो मारता क्यों नहीं मुझे,
इसकी बूंदों से मैं भर गया हूँ|

खत्म हो ये सिलसिला अब ‘वीर’,
मैं भी जिद पे अड् गया हूँ|

ख्वाबों में तुम

ढूँढ रहे हो मुझे, ख्यालों में तुम,
कैसे सुन रहे हो मुझे, आवाजों में तुम|

सवालों की गुथी उलझती जाती है,
क्यों बांध रहे हो मुझे, जवाबों में तुम|

गर्द है अरमानो के फर्श पे तो फिर,
क्यों सजा रहे हो मुझे, ख्वाबों में तुम|

मैं तो शीशे की तरह बेपर्दा हूँ,
क्यों ढाक रहे हो मुझे, नकाबों में तुम|

दिल बहला लो खूबसूरत वादियों में,
क्यों ढूंढ रहे हो मुझे, नजारों में तुम|

ये मरासिम किसी नाम का मोहताज़ नहीं,
क्यों गिन रहे हो मुझे, यारों में तुम|

सिर्फ खत नहीं कुछ अश्क भी हैं इनमे,
क्यों जला रहे हो मुझे, अंगारों में तुम|

इश्क में बिखर गया हूँ कतरा कतरा,
उड़ा रहे हो मुझे, हवाओं में तुम|

घर का पता

अनजान है रास्ता,
मंजिल की साजिशों से|
हम हैं की उससे,
घर का पता पूछते हैं|

उस अंजुमन में कोई नहीं मेरे सिवा,
हम हैं के उससे यारों का पता पूछते हैं|

कभी तुम तो कभी हम

सिलसिले ये किस बात के,
के खत्म नहीं होते|

ये कैसी कहानी है हमारी,
कभी तुम तो कभी हम नहीं होते|

याद आती तो है मगर कभी कभी,
कभी तुम तो कभी हम नहीं सोते|

दोनों दाना हैं इस बेहोशी में,
कभी तुम तो कभी हम नहीं रोते|

एक ऐसे लम्हे की तलाश है ‘वीर’,
जिसमें तू ना होता, जिसमें वो ना होते|

भीड़ यारों की

कोई बादल नहीं आसमान में,
क्या आरजू सो गई है|

नज़र आते हैं इतने साये,
क्या तन्हाई हो गई है|

महफ़िल कभी सज ना पाई तेरे बिन,
भीड़ यारों की हो गई है|

क्यों मुझे तुम मिले

पूछ रहा हूँ लकीरों से,
क्यों तुम मुझे मिले|

अब सारी खश्मकाश,
एक शख्स में समा गई|

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