ख्वाबों में तुम


ढूँढ रहे हो मुझे, ख्यालों में तुम,
कैसे सुन रहे हो मुझे, आवाजों में तुम|

सवालों की गुथी उलझती जाती है,
क्यों बांध रहे हो मुझे, जवाबों में तुम|

गर्द है अरमानो के फर्श पे तो फिर,
क्यों सजा रहे हो मुझे, ख्वाबों में तुम|

मैं तो शीशे की तरह बेपर्दा हूँ,
क्यों ढाक रहे हो मुझे, नकाबों में तुम|

दिल बहला लो खूबसूरत वादियों में,
क्यों ढूंढ रहे हो मुझे, नजारों में तुम|

ये मरासिम किसी नाम का मोहताज़ नहीं,
क्यों गिन रहे हो मुझे, यारों में तुम|

सिर्फ खत नहीं कुछ अश्क भी हैं इनमे,
क्यों जला रहे हो मुझे, अंगारों में तुम|

इश्क में बिखर गया हूँ कतरा कतरा,
उड़ा रहे हो मुझे, हवाओं में तुम|

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2 Responses

  1. |ये मरासिम किसी नाम का मोहताज़ नहीं,
    क्यों गिन रहे हो मुझे, यारों में तुम|

    ………vah bahut sundar gazal………

    • शुक्रिया

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