थक गया हूँ


अब और कितनी दूर है मंजिल,
भागते भागते मैं थक गया हूँ|

दिल लगता नहीं है किसी में,
मौत से पहले मैं मर गया हूँ|

किसकी तलाश है, कैसी तलाश है,
अपनी आवारगी से डर गया हूँ|

क्या हूँ मैं, कौन हूँ मैं,
रोज सवालों को लेकर घर गया हूँ|

सब कुछ तो है कल जैसा ही,
शायद मैं ही बदल गया हूँ|

हमसफ़र है तू या कोई मुसाफ़िर,
तेरी रहगुज़र में मैं पड गया हूँ|

काश समझ पाता मेरी कशमकश को,
जिसके लिए में ज़माने से लड़ गया हूँ|

अनजान हूँ अपने मुकद्दर से,
हासिल सब जिसके लिए मैं लग गया हूँ|

है ज़हर तो मारता क्यों नहीं मुझे,
इसकी बूंदों से मैं भर गया हूँ|

खत्म हो ये सिलसिला अब ‘वीर’,
मैं भी जिद पे अड् गया हूँ|

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5 Responses

  1. BAHUT BADIA

  2. है ज़हर तो मारता क्यों नहीं मुझे,
    इसकी बूंदों से मैं भर गया हूँ|

    bahut sunder…..

    • पदम,
      एक नई ग़ज़ल आपके नज़र ..
      http://tinyurl.com/ygscgr2

  3. खत्म हो ये सिलसिला अब ‘वीर’,
    मैं भी जिद पे अड् गया हूँ|
    Bahut khoob!

  4. Great Lines sir ……speech less …

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