हमने लबों पे मुस्कुराहट पहनी है


खामोश ज़हन में कैद बेचैनी है,
हमने लबों पे मुस्कुराहट पहनी है|

मत करो ज़ाया अपने जज़्बात तुम,
तकलीफ मेरी मुझे ही सहनी है|
हमने लबों पे मुस्कुराहट पहनी है|

धुऐं से चुभते हैं मरासिम खोकले,
बेबस आंखें रात भर बहनी है|
हमने लबों पे मुस्कुराहट पहनी है|

इल्म होता मेरी बेखुदी का उसे,
क्यों ज़रूरी हर बात कहनी है|
हमने लबों पे मुस्कुराहट पहनी है|

बयां ना कर खलिश ‘वीर’,
दुनिया जो है वही रहनी है|
हमने लबों पे मुस्कुराहट पहनी है|

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7 Responses

  1. बयां ना कर खलिश ‘वीर’,
    दुनिया जो है वही रहनी है|

    Simply beautiful! These two lines are a theory of life in itself. Outstanding.

  2. बहुत खूब भाई , पढ़ने से लगा कि आप लिखते हो तो एक डुबकर , बहुत बढिया लगी आपकी ये रचना ।

    • शुक्रिया ..

  3. बयां ना कर खलिश ‘वीर’,
    दुनिया जो है वही रहनी है|
    बिलकुल सही बात है । कौन किसी की सुनता है यहाँ सब अपनी अपनी दौद मे आगे निकलने की होड मे हैं । धन्यवाद्

  4. खामोश ज़हन में कैद बेचैनी है,
    हमने लबों पे मुस्कुराहट पहनी है|
    …very nice.

  5. मत करो ज़ाया अपने जज़्बात तुम,
    तकलीफ मेरी मुझे ही सहनी है|

    ……वाह बहुत सुन्दर रचना … बधाई

    • धन्यावाद ..

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