फिर भी हम चलते रहे


ग़मों के कांटे चुभते रहे,
फिर भी हम चलते रहे|

मिलते रहे सभी से मगर,
अपने दायरों में सिमटते रहे|
फिर भी हम चलते रहे …

मुरझाये से रहे उम्र भर,
आरजू के गुल महकते रहे|
फिर भी हम चलते रहे …

फिर मिले बिना शर्त प्यार,
बच्चों से हम मचलते रहे|
फिर भी हम चलते रहे …

गिरना तो फितरत ही थी,
गिर गिर के संभालते रहे|
फिर भी हम चलते रहे …

क्या है तेरा वजूद ‘वीर’,
मौसम से तुम बदलते रहे|
फिर भी हम चलते रहे …

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One Response

  1. ग़मों के कांटे चुभते रहे,
    फिर भी हम चलते रहे|
    —–bahut badhiya

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