बेवफ़ा मैं


अँधेरे कमरे का वो सिसकता आलम,
खामोश रात में घुलती सिसकियाँ|

सुबह दूर.. मेरी तन्हाइयों को निहारती है|

कल वो दिन,
मेरे भटकते ख्यालों की नई सौगात|
देखता हूँ खुदको रास्तों में गुम होते|

फिर उसी मोड़ पर,
वो मेरा इंतज़ार करती हुई|
फिर भी मैं नहीं रूकूंगा|

उसकी नज़रें मुझे तकती रहेंगी,
और मैं अपने अश्कों को छुपाये,
फिर मुन्तज़िर छोड़ दूंगा उसे|

बेवफ़ा मैं |

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One Response

  1. देखता हूँ खुदको रास्तों में गुम होते|
    I have seen myself in this state a million times!

    Great work!

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