तबियत से लिखा किरदार


क्यों इतना समझदार है वो,
बड़ी तबियत से लिखा किरदार है वो|

कौन है किस भेस में बता खुदी,
क्या मेरा कोई हिस्सा बीमार है वो|
बड़ी तबियत से लिखा किरदार है वो…

मैं ना बुन पाया फासले दरमियाँ,
सोहबत से बड़ा खुशगवार है वो|
बड़ी तबियत से लिखा किरदार है वो…

मैं कि रोज़गार में खोना चाहूँ,
मेरी बेजारी का कसूरवार है वो|
बड़ी तबियत से लिखा किरदार है वो…

मैं खेचता रहा लकीरों पे लकीरें,
उड़ाता रहा रेत के गुबार है वो|
बड़ी तबियत से लिखा किरदार है वो…

कैसे मिटाओगे जो छुपा है तुममे ही,
अपने वजूद का बहुत खबरदार है वो|
बड़ी तबियत से लिखा किरदार है वो…

तराश ना पाओगे जिंदिगी का पत्थर,
तुम खाली हाथ और औज़ार है वो|
बड़ी तबियत से लिखा किरदार है वो…

जब तुम मुरझाते रहे रिश्तों में,
हर तसलीम से हुआ गुलज़ार है वो|
बड़ी तबियत से लिखा किरदार है वो…

जब बसता है मेरे ही ज़हन में,
मेरा कितना हक़दार है वो|
बड़ी तबियत से लिखा किरदार है वो…

उसका एक ही जुर्म है बस,
मोहब्बत का गुनेहगार है वो|
बड़ी तबियत से लिखा किरदार है वो…

मेरी चंद मामूली से ख्वाइशें,
और बरसों मुझसे शर्मशार है वो|
बड़ी तबियत से लिखा किरदार है वो…

हम दोनों का एक ही नाम है ‘वीर’,
में जो साज़ हूँ तो आवाज़ है वो|

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