मौत का इंतज़ार


घिस घिस के हाथ लहू हुआ,
लकीरें मिट जाती क्यों नहीं|

सांसों ने बांधा है मुझे इनसे,
एक बार रूठ के जाती क्यों नहीं|

रूठी जिंदिगी को मनाया हमने बहुत,
कभी ये हमें मनाती क्यों नहीं|

है खंजर तेरा मेरे गले पे,
हलक मुझे क्यों कर डालती नहीं|

मुन्तज़िर अपनी मौत का क्यों रहे वीर,
उसकी है तो आती क्यों नहीं|

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3 Responses

  1. रूठी जिंदिगी को मनाया हमने बहुत,
    कभी ये हमें मनाती क्यों नहीं|
    “सुन्दर अभिव्यक्ति…….”
    regards

    • shukriya..

  2. मौत का इंतज़ार

    मुन्तज़िर अपनी मौत का क्यों रहे वीर,
    उसकी है तो आती क्यों नहीं|

    सुहान अल्लाह

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