आग


दूर खड़ा वो आग को देखता है…
आग की गर्मी महसूस होती है|

उसे हमेशा कशिश थी आग जैसा होने की..
शायद उसे अपना कोई हिस्सा वहाँ बुलाता है|
दूर खड़ा वो आग को देखता है…

बढते हैं कदम तो पसीने से,
जैसे उसने बाकी अपने हिस्से पिघला दिए है|
जितना करीब वो जाता उतनी आग बढती|

खूबसूरत लगती है वो लौ,
उसे इल्म हैं की एक हद से आगे बढना ठीक नहीं|
उसके अंदर आग के अलावा भी बहुत कुछ है|

संभाल के रखता है अपने कदम|
क्या छु लूँ इसे?
एक ज़क्म हो जाएगा!

लोग पागल कहेंगे, पर लोगों का वो कब था!
वो ज़ख्म उसे गवारा था.. बहुत प्यारा था|
उसे साथ लेकर एक हिस्सा अपना जी लेगा वो|

वो आग को बढता है…

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One Response

  1. ग़ज़ब की कविता … कोई बार सोचता हूँ इतना अच्छा कैसे लिखा जाता है .

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