तलाश


दीवारों में कुछ छेद थे… इन्हें आज भर दिया|
अब इंतज़ार इनसे लिपट तो सकता है,
मगर ख्यालों तक नहीं पहुंचेगा|

दर्द चुनवा दिए हैं…यह अब ज़हन में क़ैद रहेगा|
किसी चरागाह की तलाश नहीं है|
अब इसे भी घुटन नहीं होती|

मायने जिंदिगी के मुझे नहीं सताते… बेमतलब ही सही वजूद|
अब अपनी खुदी को आईने में देखने की ज़रूरत नहीं|

कोई हाथ बढाये तो थम लेंगे… वो लम्हा जी लेंगे|
उस हाथ की लकीरों में शायद मैं कहीं था|
हमारे हातों से तो हमने सब मिटा दिया है|

हर कोई मुझे अपने रंग में रंग ले|
अपने कच्चे पक्के घड़े में डाल ले|
मैं तो पानी ही हूँ उनके लिए|
अपने घड़े तोड़ दिए हैं मैंने|

यूँ बसर रहेगी अपनी… तलाश के बिना|
खाल बस है..
उसे उकेल के कुछ हासिल नहीं है किसी को|

एक दुनिया क़यामत के इंतज़ार में खुद को ज़र्रा ज़र्रा मार रही है|
कोई आवाज़, कोई लफ्ज़, कोई सबूत, कोई गवाह नहीं है इसका|

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3 Responses

  1. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा

  2. हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

  3. कोई हाथ बढाये तो थम लेंगे… वो लम्हा जी लेंगे|
    उस हाथ की लकीरों में शायद मैं कहीं था|
    हमारे हातों से तो हमने सब मिटा दिया है|…….
    ……..सुंदर पंक्तियाँ। प्रभावपूर्ण रचना। अच्छी लगी।

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