शिकवा जिंदिगी से


अब ना कोई शिकवा है जिंदिगी से,
ज़हर पी लिया हमने अपनी खुशी से|

भटकते ख्यालों का जशन ना हो खत्म,
कुछ सिलसिले बना रखे हैं सभी से|
अब ना कोई शिकवा है जिंदिगी से…

ढूँढता है वो मुझे गलियों गलियों,
जब हम मिट चुके हैं कभी के|
अब ना कोई शिकवा है जिंदिगी से…

मेरा नाम लिए फिरता हैं शहर भर,
मैं उसे पहचानू कैसे सभी से|
अब ना कोई है शिकवा जिंदिगी से…

वो लम्हा काफी है उम्र भर को ‘वीर’,
उस लम्हे में हम मिले थे खुदी से|

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One Response

  1. वो लम्हा काफी है उम्र भर को ‘वीर’,
    उस लम्हे में हम मिले थे खुदी से

    -बहुत बढ़िया.

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