मुझे और खोकला कर गए ना तुम


मेरे ख्यालों से भर गए ना तुम,
मुझे और खोकला कर गए ना तुम|

इतना सहम गए शीशे से क्यों,
अपने अक्स से ही डर गए ना तुम|
मुझे और खोकला कर गए ना तुम…

मुझे दे कर जिंदिगी सज़ा में,
खुद लम्हा लम्हा मर गए ना तुम|
मुझे और खोकला कर गए ना तुम…

मैं अब भी खड़ा हूँ उसी जगह,
आखिर अकेला छोड़ बढ़ गए ना तुम|
मुझे और खोकला कर गए ना तुम…

तेरी फितरत नहीं है गिरेबान पकड़ने की,
फिर क्यों आज हर किसी से लड़ गए ना तुम|
मुझे और खोकला कर गए ना तुम…

मैं गुजरता रहा बेखुदी राहों पर,
मेरे ज़हन के हर मोड पर पढ़ गए ना तुम|
मुझे और खोकला कर गए ना तुम…

मुझे जिसका डर था हुआ ना फिर वही,
कहा था तुम से पर गए ना तुम|
मुझे और खोकला कर गए ना तुम…

कहा था ना रख कोई दर्द दिल में ‘वीर’,
देख इनके बोझ से गढ़ गए ना तुम|
मुझे और खोकला कर गए ना तुम…

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3 Responses

  1. मैं गुजरता रहा बेखुदी राहों पर,
    मेरे ज़हन के हर मोड पर पढ़ गए ना तुम|
    मुझे और खोकला कर गए ना तुम…

    बहुत खूब, लाजबाब !

  2. bahut umda gazal…badhai

  3. बहुत उम्दा रचना!

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