लब तक आते तो हैं


गम जो लफ़्ज़ों में घुल नहीं पाते,
लब तक आते तो हैं|

खत जो हम उन्हें लिख नहीं पाते,
तन्हाई में जलाते तो हैं|
लब तक आते तो हैं…

जो फ़साने उसे हम कह नहीं पाते,
अजनबियों को सुनाते तो हैं|
लब तक आते तो हैं…

तो क्या अगर हवा से बिखर जाए,
हम फिर भी घर बनाते तो हैं|
लब तक आते तो हैं…

क्या थाम लेंगे वो मुझे गिरते हुए,
दोस्त हाथ मिलाते तो हैं|
लब तक आते तो हैं…

हर तमन्ना हासिल हो ज़रूरी नहीं,
हम ख्वाब सजाते तो हैं|
लब तक आते तो हैं…

ना सही दिल में थोड़ी जगह मेरे लिए,
लोग हमको घर बुलाते तो हैं|
लब तक आते तो हैं…

हम ना सही हसने की हालत में ‘वीर’,
सबको हम थोडा हसाते तो हैं|
लब तक आते तो हैं…

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One Response

  1. बहुत ही बढ़िया!!

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