ना जी पाओगे


ख्यालों से मुझे ना समझ पाओगे,
लफ़्ज़ों से मुझे ना पकड़ पाओगे|

मेरे दर्द का एहसास तो होगा तुम्हे,
मेरी नम आँखों का ना देख पाओगे|

मुझे कतरा कतरा बाँट तो लोगे तुम,
इन कतरों से मुझे ना जोड़ पाओगे|

सुन भी लोगे सदा अगर चाहो तो,
मगर मेरी आह को ना सुन पाओगे|

मशवरा है कि ना आओ मेरे करीब,
इस गहराई में तुम भी डूब जाओगे|

मैं तन्हा ही रहूँगा ये हकीकत है,
तन्हाई मुझसे जुदा ना कर पाओगे|

तोड़ तो लोगे तुम मेरे शीशमहल को,
इसकी तस्वीर मुझसे ना छीन पाओगे|

आना भी चाहोगे अगर कभी अगर,
रास्तों को मुझ तक ना मोड़ पाओगे|

हो भी जाए अगर ज़हर पीना तुम्हे गवारा,
इस ज़हर को पिके मुझसे ना जी पाओगे|

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3 Responses

  1. हो भी जाए अगर ज़हर पीना तुम्हे गवारा,
    इस ज़हर को पिके मुझसे ना जी पाओगे|.nice

  2. bahut khoob…aapne bahut achha likha hai….khoobsoorat rachna

  3. I somehow feel each heart can relate to this one. So experienced yet so unique! You have a way with words 🙂 Keep it up!

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