सहम जाता है


उसूल दरवाज़ा खटखटाते हैं तो जज़्बात सहम जाता है,
दिल बच्चा सा है हमारा थोड़ी आहट से सहम जाता है|

सही और गलत के दायरों में ढलते ढलते,
मासूम एक नन्हा सा दिल मचल जाता है|

झूट और सच का आईना बड़ा कमज़ोर होता है,
हसरत के एक छोटे से पत्थर से ये चटक जाता है|

सोचता हूँ सारे दर्द तो कर लिए हैं मैंने महसूस,
फिर क्यों उसे मिलकर ये आँसू छलक जाता है|

रोना ना मेरी फितरत हैं ना कोई मजबूरी,
बस कभी कभी दिल यूँ ही सिसक जाता है|

कभी ज़हन समुन्दर सा सब पी लेता है,
तो कभी तूफ़ान सा भड़क जाता है|

जब गुलिस्तां में खिज़ा का मौसम है बरसों से,
एक सूखे फूल की खुशबू से ये महक जाता है|

तुम भी जानते हो ख्वाबों की हकीकत को,
पर दिल-ए-नादाँ इनसे ही लिपट जाता है|

है गुमराह अपनी जिंदिगी इस कदर ‘वीर’,
ये आवारा दूसरों के रास्तों पर भटक जाता है|

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4 Responses

  1. रोना ना मेरी फितरत हैं ना कोई मजबूरी,
    बस कभी कभी दिल यूँ ही सिसक जाता है|

    ati sundar

  2. सही और गलत के दायरों में ढलते ढलते,
    मासूम एक नन्हा सा दिल मचल जाता है|

    सुंदर शेर ………….

  3. बहुत खूब, लाजबाब !

  4. सहमने का सफ़र सुन्दर है , जाने क्यूं

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