ज़ख्म


माज़ी के दाग यादों से जाते क्यों नहीं,
मैं तो भुल चला, ये ज़क्म मुझे भुलाते क्यों नहीं|

झटक दूं इन्हें ज़हन से तो साँस मिले,
मार तो दिया है मुझे, ज़ालिम दफनाते क्यों नहीं|

ना अश्क से सींचा, ना ख्यालों की ज़मीन दी,
फिर भी दर्द के ये फूल, मुरझाते क्यों नहीं|

क्या तेरा रूठना गवारा है हसरतों को ‘वीर’,
ख्वाब नए देकर तुझे मनाते क्यों नहीं|

Advertisements

One Response

  1. मार तो दिया है मुझे, ज़ालिम दफनाते क्यों नहीं|

    bahut kubh line he

    baki gazal bhi achai he

    shekhar kumawat

    http://kavyawani.blogspot.com/

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: