नादां


ऐसे नादां की हर ठोकर पर गिरते हैं,
फिर भी हम दाना बने फिरते हैं|

कौन मरता है किसी के साथ यहाँ,
कैसे हमदम जाना बने फिरते हैं|
फिर भी हम दाना बने फिरते हैं…

कहने को एक घर है पास लेकिन,
कितने साये वीराना बने फिरते हैं|
फिर भी हम दाना बने फिरते हैं…

जाने क्या ढूँढते हैं गलियों गलियों,
क्यों हम दीवाना बने फिरते हैं|
फिर भी हम दाना बने फिरते हैं…

वक्त भी अजब सौदागर है ‘वीर’,
चंद लम्हे ज़माना बने फिरते हैं|

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One Response

  1. वक्त भी अजब सौदागर है ‘वीर’,
    चंद लम्हे ज़माना बने फिरते हैं|

    bahut sundar

    wow !!!!!!!!!!

    shekhar kumawat

    http://kavyawani.blogspot.com/

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