प्यासा रहता है


कोई सहरा में बूँद ढूँढता है,
कहीं सागर भी प्यासा रहता है|

कहीं चार लम्हें जिंदिगी बन जाते हैं,
कहीं कोई बरसों पल पल मरता है|
कहीं सागर भी प्यासा रहता है…

कभी अश्क पी लेता है छलकने से पहले,
कभी खामोश तन्हा सिसकता रहता है|
कहीं सागर भी प्यासा रहता है…

कहीं लफ्ज़ कह नहीं पाते हैं खलिश,
कोई आँखों से ही सब कहता है|
कहीं सागर भी प्यासा रहता है…

कहीं किस्मत को इलज़ाम मिलते हैं ‘वीर’,
कोई कहीं वक्त सा बहता है|
कहीं सागर भी प्यासा रहता है..

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