मैं बिखर जाता हूँ


तेरी खुशी में ही अपनी खुशी पाता हूँ,
तुम सिमट जाओ मैं बिखर जाता हूँ|

मिलूँ तुम्हे हर शय के कतरे में,
यूँ तेरी खुदी में बरस जाता हूँ|
तुम सिमट जाओ मैं बिखर जाता हूँ…

है नहीं उम्र देने को पास मेरे,
हाँ कुछ लम्हें ज़रूर चुरा लाता हूँ|
तुम सिमट जाओ मैं बिखर जाता हूँ…

मुझे सदा अपने दिल ही में पाओगे,
तुमसे भला मैं कब दूर जाता हूँ|
तुम सिमट जाओ मैं बिखर जाता हूँ…

नाराज़ ना होना फितरत से तुम,
मैं अक्सर तन्हाइयों में खो जाता हूँ|
तुम सिमट जाओ मैं बिखर जाता हूँ…

बेसबब ही नम हो जाती हैं आंखें कभी,
शायद मैं उसके दिल में धड़क जाता हूँ|
तुम सिमट जाओ मैं बिखर जाता हूँ…

मैं बेवफा नहीं बस वक्त ही हूँ ‘वीर’,
गुज़रते गुज़रते गुज़र जाता हूँ|
तुम सिमट जाओ मैं बिखर जाता हूँ…

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11 Responses

  1. तुम सिमट जाओ मैं बिखर जाता हूँ

    सारे एहसास इन पंक्तियों में समा गए …..बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

  2. nnnnice

  3. मैं बेवफा नहीं बस वक्त ही हूँ ‘वीर’,
    गुज़रते गुज़रते गुज़र जाता हूँ|
    तुम सिमट जाओ मैं बिखर जाता हूँ…

    waah bahut Achche..Sunder Bhav….

  4. है नहीं उम्र देने को पास मेरे,
    हाँ कुछ लम्हें ज़रूर चुरा लाता हूँ|
    तुम सिमट जाओ मैं बिखर जाता हूँ…
    …pyarbhare ahsaas ka bhavpurn chitran bahut achha laga….

  5. अहा क्या बात कही है ….

    तेरी खुशी में ही अपनी खुशी पाता हूँ,
    तुम सिमट जाओ मैं बिखर जाता हूँ|

    सारा का सारा सार इसमें ही है .
    वाह जी वाह …

  6. bahut achha

  7. awesome !

  8. बहुत बढिया !!

  9. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

  10. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति……

  11. कल मंगलवार को आपकी रचना … चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है

    http://charchamanch.blogspot.com/

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