लम्हा लम्हा


लम्हा लम्हा जोड़ कर ज़माना बना लिया,
कभी खत्म ना हो ऐसा फ़साना बना लिया|

चाहत में पिरो के हसीन लम्हों को,
वक्त को खुदसा दीवाना बना लिया|
लम्हा लम्हा जोड़ कर ज़माना बना लिया…

कुछ बेख्याल हूँ आज शाम से,
खुदको खुदसे बेगाना बना लिया|
लम्हा लम्हा जोड़ कर ज़माना बना लिया…

तेरे साथ को महफ़िल तेरी ख़ामोशी को साज़,
तेरी आँखों को हमने पैमाना बना लिया|
लम्हा लम्हा जोड़ कर ज़माना बना लिया…

महकता हूँ तेरी खुशबू से अब तलक,
धडकन को तेरा तराना बना लिया|
लम्हा लम्हा जोड़ कर ज़माना बना लिया…

हर नए एहसास का तू गुनाहगार है ‘वीर’,
तेरी खलिश ने इसे ज़क्म पुराना बना लिया|
लम्हा लम्हा जोड़ कर ज़माना बना लिया…

था हँसता हुए शहर सा तेरा ज़हन ‘वीर’,
तेरी फितरत ने इसे वीराना बना दिया|
लम्हा लम्हा जोड़ कर ज़माना बना लिया…

तेरे दर्द की क्या कोई कीमत है ‘वीर’,
उसकी मोहब्बत ने इसे खज़ाना बना दिया|
लम्हा लम्हा जोड़ कर ज़माना बना लिया…

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2 Responses

  1. वाह , आपने तो लम्हा लम्हा जोड़ कर तराना बना लिया !

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