सौदा


बस कीमत का फर्क है,
यहाँ सब बिकता है|
यह सौदा ठीक लगता है…

उनको झूठा अदब देकर,
उनसे झूटी इज्ज़त लेकर,
इतना अकडकर चलता है|
यह सौदा ठीक लगता है…

हर दिन की कश्मकश,
हर रात का काला सच,
लम्हा लम्हा मरता है|
यह सौदा ठीक लगता है…

अकेला घिरा भीड़ में,
तन्हा फिरा भीड़ में,
खुदसे इतना डरता है|
यह सौदा ठीक लगता है…

कभी उसे कोने में फेका,
कभी उन्हें कोने से देखा,
मायूस दिल आरजू करता है|
यह सौदा ठीक लगता है…

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One Response

  1. सुन्दर रचना है।

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