दुआ में असर रहे


कभी तो दुआ में असर रहे,
कभी तो उसकी हम पर नज़र रहे|

मैं तोड़ दूंगा सारी बंदिशें सनम,
तुझमें साथ चलने का जिगर रहे|
कभी तो दुआ में असर रहे…

बेखुदी उलझा ले चाहे जितना,
तुम्हे जिंदिगी की तो कदर रहे|
कभी तो दुआ में असर रहे…

पत्थर पर्वत नदी हो या तूफ़ान,
बस चलते जाने का हुनर रहे|
कभी तो दुआ में असर रहे…

आवारगी जब भी करे गुमराह,
घर तक जाती कोई डगर रहे|
कभी तो दुआ में असर रहे…

प्यार भी होता मौत सा अगर,
हर वक्त बस मुयास्सर रहे|
कभी तो दुआ में असर रहे…

उन्ही लहरों से डूबे तुम ‘वीर’,
जिनसे खेलते तुम अक्सर रहे|
कभी तो दुआ में असर रहे…

ना सुध है ज़माने की ना सही,
खुदको खुदकी तो खबर रहे|
कभी तो दुआ में असर रहे…

पथरीले रास्तों से क्या डरना,
बात कुछ और गर हमसफ़र रहे|
कभी तो दुआ में असर रहे…

सब हासिल कितना बेरंग होगा,
कुछ तो जिंदिगी में कसर रहे|
कभी तो दुआ में असर रहे…

गर ना रहे मेहकता प्यार से,
घर में सुकून की तो बसर रहे|
कभी तो दुआ में असर रहे…

यही मुनासिब है आदमी के लिए,
अपनी राह पर सर बसर रहे|
कभी तो दुआ में असर रहे…

जो नहीं तेरे दिल में आशियाँ,
बता दे अब ‘वीर’ किधर रहे|
कभी तो दुआ में असर रहे…

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4 Responses

  1. बेहतरीन प्रस्तुति…………सुन्दर व सशक्त रचना……बधाई।

  2. waah bahut khoob sir…

    • shukriya.

  3. प्यार भी होता मौत सा अगर,
    हर वक्त बस मुयास्सर रहे|
    कभी तो दुआ में असर रहे…

    उन्ही लहरों से डूबे तुम ‘वीर’,
    जिनसे खेलते तुम अक्सर रहे|
    कभी तो दुआ में असर रहे…

    अरे वाह वीर साहेब क्या गजब का लिखा है आपने …
    ना जाने क्यों,
    पिछले दो तीन दोनों से आपको याद कर रहा था मैं .

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