मंजिलों से रास्ता लेकर


हम भागते रहे मंजिलों से रास्ता लेकर,
वो जुड़ते रहे दिलों में फासला लेकर|

तोड़ कर हमने फिर पहनली जंजीरें,
वो फिर आ गए वही वास्ता लेकर|
हम भागते रहे मंजिलों से रास्ता लेकर…

इन आँखों को अब रंग नहीं दिखते,
बस जमी है एक तस्वीर माजरा लेकर|
हम भागते रहे मंजिलों से रास्ता लेकर…

बीती रात हुआ फिर वही ना ‘वीर’,
रोये हम दीवारों का आसरा लेकर|
हम भागते रहे मंजिलों से रास्ता लेकर…

अब इसे रुसवाई कैसे समझे ‘वीर’,
वो जुदा हुआ होठों पे कुछ कांपता लेकर|

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2 Responses

  1. बहुत खूब

  2. वो जुड़ते रहे दिलों में फासला लेकर…..

    bahut achchhi…

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