तेरे कुछ आंसू


तेरे कुछ आंसू मेरी आँखों से छलक गए,
मेरे दिल में कुछ शोले से भड़क गए|

ना मिला हवाओं का आसरा भी इन्हें,
गम के बादल ज़हन में अटक गए|
तेरे कुछ आंसू मेरी आँखों से छलक गए…

क्यों थामता है उसी का दामन फिर,
जिनकी नज़र को भी तुम तरस गए|
तेरे कुछ आंसू मेरी आँखों से छलक गए…

देख कर घरों की दरारों को ‘वीर’,
हम रास्ते भी तुझ से भटक गए|
तेरे कुछ आंसू मेरी आँखों से छलक गए…

अब सच भी बोलो तो नाप तोलकर ‘वीर’,
तेरे सफ़ेद झूटों से आईने चटक गए|
तेरे कुछ आंसू मेरी आँखों से छलक गए…

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