जिस्म से रूह तक

जिस्म से रूह तक सब लडखडाता है,
जंग खाया कोई रिश्ता टूटता जाता है|

फिर संग लिए अपने कांधों पर,
कोई दीवाना घर नया बनाता है|
जंग खाया कोई रिश्ता टूटता जाता है…

अपने अश्कों की कद्र उसे कब थी,
उसकी राहों में फूल बिछाता है|
जंग खाया कोई रिश्ता टूटता जाता है…

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जहाँ हम मिले थे

जहाँ कुछ लम्हें, मेरा हिस्सा बन गए|

जहाँ लम्हों में, सदियाँ गुज़ार गई थी|

जहाँ तेरी कसक मेरी तलाश थी|

जहाँ एक लहर समुन्दर बन गयी थी|

जहाँ खुदी सिर्फ एक खिलौना थी|

जहाँ वहम का वजूद नहीं था|

जहाँ सही गलत के दायरे खोखले थे|

जहाँ दर्द मोहब्बत में बिखरा था|

जहाँ आरजू सिसकती नहीं थी|

जहाँ ख्याल पहुँच नहीं पाते थे|

जहाँ लफ्ज़ हथियार डाल देते थे|

जहाँ ख्वाब खुदको तन्हा पाते थे|

जहाँ कुछ धुंधला सा… आँखों में तस्वीर सा जम गया था|

हाँ वो जगह,
जहाँ तुम और मैं मिले थे…

लंगड़ा वक्त

यादों के बोझ से वक्त लंगड़ा गया है!

घड़ी के दो काँटों की बैसाखी लिए..
शाम से रेंग रहा है यहाँ|
इसके हर कदम की आहट साफ़ साफ़ सुनाई देती है|

यही वक्त था जो हमारे हाथों से यूँ फिसल जाया करता था|
कैसे ख़ामोशी से ये अपने तेज कदम रखता था|

आकर देखो,
मैंने इसे कुछ लम्हों से कैसे बांध दिया है!
लंगड़ा वक्त!!

मैं इनका खुदा हूँ

ये सब जो भागता है नज़रों में..
ये चेहरे जो बार बार देखते हैं मेरी तरफ..
ये रिश्ते जो अक्सर बांधते हैं मुझे अपने दामन से..
ये ख्याल जो मुझे अक्सर मायूस करते हैं…
ये लफ्ज़ जो भटकते है अनाथ बच्चों से..
ये इश्क जो मुझे दीवाना बनाता है..
ये बंदगी जो मुझे खोकला करती है..
ये रूह जो मुझे प्यासा रखती है..

सब फ़ना है मेरी खुदी से!
अब इनके सजदों का मैं खुदा हूँ!

एक दिल है

एक दिल है, और हसरत कितनी|
एक खुदी है, और बरकत कितनी|

एक इश्क है, और हरकत कितनी|
एक शख्स है, और कुर्बत कितनी|

एक बिस्तर है, और सिलवट कितनी|
एक नींद है, और करवट कितनी|

एक मरासिम है, और फुर्क़त कितनी|
एक दरवाज़ा है, और खटखट कितनी|

एक जिंदिगी है, और फुर्सत कितनी|
एक दुनिया है, और नफरत कितनी|

नसीब ना हुआ

उन ग़ज़लों को स्याही का कफ़न नसीब ना हुआ,
उन नज्मों को आवाज़ का मज़ार नसीब ना हुआ..

उन रिश्तों को नाम का लिबास,
उन अश्कों को दामन-ए-यार..
नसीब ना हुआ..

उन कहानियों को याद का सहारा..
उन लम्हों को ज़ुल्फ़-ए-यार..
नसीब ना हुआ..

उन सावलों को जवाब,
उन जवाबों को इंतज़ार…
नसीब ना हुआ..

साथ हूँ तुम्हारे

वीर

भीड़ में गुम होता एक शख्स…
मेरे कुछ रंग अपने चेहरे में लगाये|
मुझसा दिखता है|
ओझल होता उसका साया घुलता जाता है लोगों में|

मुझे अंदर खलिश सताती है|
सोचता हूँ भाग के उसे पकड़ लूँ|
कुछ उसके रंग अपने चेहरे पे लगा लूँ|

रोकता हूँ खुद को..
कहता हूँ बस शायद मोहब्बत है|
इश्क की दीवानगी है|
मैं तो सयाना हूँ अब|

जितना ओझल होता है वो…
उतना कुछ मुझे अंदर जकड़ता है|
मेरे पैर जम से गए हैं|
अपना हाथ देखा तो समझा ये रंग दर्द का है|

मेरे ज़हन में एक लौ सच्चाई की जलती है|
जहाँ इश्क, मोहब्बत, वफ़ा नहीं पहुँचती अक्सर..
उन गमों की सदा सुनता हूँ|

मेरे पैरों में खून पिघलता है..
मेरी सांसें उसका नाम चीखती हैं|
में भाग रहा हूँ तुझ तक आने के लिए|
सारी भीड़ में तू मुझे साफ दिखता है|

मैं नहीं खोऊंगा तुझे|
सुन रहे हो ना तुम मेरे क़दमों की आहट|

पलट के देखो, मैं साथ हूँ तुम्हारे…. हमेशा|

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