नज़र मिलायें तो मिलायें कैसे

बेरुखी का सबब बतायें तो बतायें कैसे,
तुमसे नज़र मिलायें तो मिलायें कैसे|

कोई शख्स हो तो भुल भी जायें हम,
खुदको खुदसे भुलायें तो भुलायें कैसे|
तुमसे नज़र मिलायें तो मिलायें कैसे…

जिसकी तामीर में उम्र गुज़ार गयी,
उस घर को छोडके जायें तो जायें कैसे|
तुमसे नज़र मिलायें तो मिलायें कैसे…

आँखों में तस्वीर सा है मरासिम जो,
उस तस्वीर को मिटायें तो मिटायें कैसे|
तुमसे नज़र मिलायें तो मिलायें कैसे…

मायूस बच्चे सा दिल बस वहीँ अटका है,
बिना उसके इसे बहलायें तो बहलायें कैसे|
तुमसे नज़र मिलायें तो मिलायें कैसे…

उसने मुह मोड़ लिया अब तुझसे ‘वीर’,
तू ही बता अब उसे मनायें तो मनायें कैसे|
तुमसे नज़र मिलायें तो मिलायें कैसे…

इतनी मोहब्बत थी तुझसे ‘वीर’ हमें,
तेरी लाश को अब जलायें तो जलायें कैसे|
तुमसे नज़र मिलायें तो मिलायें कैसे…

बिछड़ा यार नहीं मिलता

खुदा भी शायद नाराज़ है हमसे,
मिन्नतों से बिछड़ा यार नहीं मिलता|

इसमें कहाँ पहले सी बात रही,
अब शराबों से खुमार नहीं मिलता|
मिन्नतों से बिछड़ा यार नहीं मिलता…

मिलते हैं रिश्ते विरासत में यहाँ,
हर रिश्ते में लेकिन प्यार नहीं मिलता|
मिन्नतों से बिछड़ा यार नहीं मिलता…

मिलती नहीं है मौत से मोहलत कोई,
फिर कोई शख्स क्यों तैयार नहीं मिलता|
मिन्नतों से बिछड़ा यार नहीं मिलता…

कुछ गुलों की किस्मत मुझ जैसी है,
ज़मीन तो मिली मगर गुलज़ार नहीं मिलता|
मिन्नतों से बिछड़ा यार नहीं मिलता…

बहा देना सब गर मिले कोई दामन काबिल,
अश्कों को ये मौका बार बार नहीं मिलता|
मिन्नतों से बिछड़ा यार नहीं मिलता…

क्या शिकायत किजीये किसी से ‘वीर’,
हम आवारों को कहीं दयार नहीं मिलता|
मिन्नतों से बिछड़ा यार नहीं मिलता…

अब लाया है मर्ज़ ए इश्क का इलाज़ ‘वीर’,
जब शहर में उसे कोई बीमार नहीं मिलता|
मिन्नतों से बिछड़ा यार नहीं मिलता…

दुआ में असर रहे

कभी तो दुआ में असर रहे,
कभी तो उसकी हम पर नज़र रहे|

मैं तोड़ दूंगा सारी बंदिशें सनम,
तुझमें साथ चलने का जिगर रहे|
कभी तो दुआ में असर रहे…

बेखुदी उलझा ले चाहे जितना,
तुम्हे जिंदिगी की तो कदर रहे|
कभी तो दुआ में असर रहे…

पत्थर पर्वत नदी हो या तूफ़ान,
बस चलते जाने का हुनर रहे|
कभी तो दुआ में असर रहे…

आवारगी जब भी करे गुमराह,
घर तक जाती कोई डगर रहे|
कभी तो दुआ में असर रहे…

प्यार भी होता मौत सा अगर,
हर वक्त बस मुयास्सर रहे|
कभी तो दुआ में असर रहे…

उन्ही लहरों से डूबे तुम ‘वीर’,
जिनसे खेलते तुम अक्सर रहे|
कभी तो दुआ में असर रहे…

ना सुध है ज़माने की ना सही,
खुदको खुदकी तो खबर रहे|
कभी तो दुआ में असर रहे…

पथरीले रास्तों से क्या डरना,
बात कुछ और गर हमसफ़र रहे|
कभी तो दुआ में असर रहे…

सब हासिल कितना बेरंग होगा,
कुछ तो जिंदिगी में कसर रहे|
कभी तो दुआ में असर रहे…

गर ना रहे मेहकता प्यार से,
घर में सुकून की तो बसर रहे|
कभी तो दुआ में असर रहे…

यही मुनासिब है आदमी के लिए,
अपनी राह पर सर बसर रहे|
कभी तो दुआ में असर रहे…

जो नहीं तेरे दिल में आशियाँ,
बता दे अब ‘वीर’ किधर रहे|
कभी तो दुआ में असर रहे…

जवां हो जाने की

अहिस्ता रख ज़ख्मों पर हाथ सनम,
इनकी तासीर है जवां हो जाने की|

शमा-ए-मोहब्बत ना रहेगी उम्र भर,
इसकी किस्मत है धुआं हो जाने की|
इनकी तासीर है जवां हो जाने की..

हर वक्त क्या ढूँढता है लोगों में तू,
तुझे बिमारी है गुमां हो जाने की|
इनकी तासीर है जवां हो जाने की…

मत कर महसूस इतना हर बात को ‘वीर’,
गिलों की आदत है जमा हो जाने की|
इनकी तासीर है जवां हो जाने की…

कौन कब तलक संभालेगा तुझे ‘वीर’,
तेरी फितरत ही है फना हो जाने की|
इनकी तासीर है जवां हो जाने की…

प्यार के चंद किस्से हैं

प्यार के चंद किस्से हैं,
सब मेरे ही हिस्से हैं|

एक ही अंजाम सबका,
खामोश हम सिसके हैं|
प्यार के चंद किस्से हैं…

वो समझा नहीं हमें,
हुए हम पूरे जिसके हैं|
प्यार के चंद किस्से हैं…

अब अपना कुछ कहाँ,
हम जो हैं सब उसके हैं|
प्यार के चंद किस्से हैं…

कोई ग़ज़ल नहीं जिंदिगी,
बिखरे हुए कुछ मिसरे हैं|
प्यार के चंद किस्से हैं…

कहानी का तू किरदार नहीं ‘वीर’,
यहाँ बस तेरे कुछ ज़िक्रे हैं|
प्यार के चंद किस्से हैं…

कहने दो ना जिंदिगी

वहमों में रहने दो ना जिंदिगी,
कहने को कहने दो ना जिंदिगी|

ग़मों का दरिया या गिलों की बारिश,
हमें हर हाल में बहने दो ना जिंदिगी|
कहने को कहने दो ना जिंदिगी…

सब दिखता है मेरे अलावा मुझको,
मुझे कुछ नए आईने दो ना जिंदिगी|
कहने को कहने दो ना जिंदिगी…

आसान ना होगा

नाज़ुक दिल में सितमगर रखना आसान ना होगा,
उसकी बेरुखी से कब तू वीर परेशान ना होगा|

शायद वहम ही हो उसकी मोहब्बत दोस्त मगर,
वहम के बगैर भी दिल को आराम ना होगा|
नाज़ुक दिल में सितमगर रखना आसान ना होगा…

माना मशहूर है किस्सा मेरी वफ़ा का यारों,
कौन आशिक शहर में बदनाम ना होगा|
नाज़ुक दिल में सितमगर रखना आसान ना होगा…

एक आशियाँ के हैं तलबगार कितने यहाँ,
बात और के सबको कबूल ये अंजाम ना होगा|
नाज़ुक दिल में सितमगर रखना आसान ना होगा…

यूँ तो शराब भी है और महफ़िल भी यहाँ,
बस मेरे हाथों में तेरा दिया जाम ना होगा|
नाज़ुक दिल में सितमगर रखना आसान ना होगा…

मैं खामोश ही सह लूँगा तेरे सब सितम,
मेरे होठों पे मगर कोई इलज़ाम ना होगा|
नाज़ुक दिल में सितमगर रखना आसान ना होगा…

बस ज़ाहिर है ज़बीं की लकीरों से ‘वीर’,
तेरी जुबां से ये काम ना होगा|
नाज़ुक दिल में सितमगर रखना आसान ना होगा…

जो धड़कता है वो बुझ भी जायेगा,
आखिर कब तलक ये तमाम ना होगा|
नाज़ुक दिल में सितमगर रखना आसान ना होगा…

तोड़ दे दिल इस बार ऐसे मेरे खुदा,
बंदे को फिर कभी ये गुमान ना होगा|
नाज़ुक दिल में सितमगर रखना आसान ना होगा…

तू रहा यूँ ही अगर फितरत से उखड़ा ‘वीर’,
तेरी किस्मत में एक भी रस्मी सलाम ना होगा|
नाज़ुक दिल में सितमगर रखना आसान ना होगा…

लिखते लिखते बेचैन हो गया है ‘वीर’,
अब और उससे कलाम ना होगा|
नाज़ुक दिल में सितमगर रखना आसान ना होगा…

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