इज़हार

सोच रहा था शाम ओ सेहर,
कौन सा रंग बहार का है|

तुमको देखा तो लगा,
रंग जो तेरे रुखसार का है|

गम और ख़ुशी में फर्क है कितना,
एक लम्हा जो तेरे दीदार का है|

वो मिले या न मिले,
इश्क में मज़ा इज़हार का है|

मिटाएगा कौन तेरे जज़्बात को,
दर क्यों तुझे इनकार का है|

बदलेंगे ज़माने के तौर भी सनम,
सवाल बस तेरे इकरार का है|

बीतेगी अब हर घडी देर से,
पल जो इंतज़ार का है|

फासला कितना है हमारे दरमियाँ,
सफ़र एक पुकार का है|

सुरूर क्या जो रहे ना उम्र भर,
ऐ साकी तेरा महखाना बेकार का है|

जब से पिया है उस नज़र से,
हर लम्हा खुमार का है|

मिले थे कभी जिस जगह तुम,
आशियाँ अब वो मेरे मज़ार का है|

और क्या है ज़िन्दगी बता ‘वीर’,
सौदा एक लाचार का है|

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