ज़िन्दगी

बातों ही बातों में, कट गयी ज़िन्दगी मेरी,
कितने रिश्तों में, बट गयी ज़िन्दगी मेरी|

अपनी सुध थी न ज़माने की खबर,
इश्क के बाज़ार में लुट गयी ज़िन्दगी मेरी|

कुछ वक़्त का तकाज़ा था, कुछ हालात की मजबूरी,
हर रोज़ बदल गयी, शक्सियत मेरी|

तुझे अपना कहूं तो किस हक से ‘वीर’,
तेरी साँसों ने छीन ली ज़िन्दगी मेरी|

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