जिस्म से रूह तक

जिस्म से रूह तक सब लडखडाता है,
जंग खाया कोई रिश्ता टूटता जाता है|

फिर संग लिए अपने कांधों पर,
कोई दीवाना घर नया बनाता है|
जंग खाया कोई रिश्ता टूटता जाता है…

अपने अश्कों की कद्र उसे कब थी,
उसकी राहों में फूल बिछाता है|
जंग खाया कोई रिश्ता टूटता जाता है…

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