दर्द ये एक गुमनाम सा है

ये वक्त इम्तेहान का है,
इश्क के अंजाम का है|

हो फना उसकी चाहत में,
इरादा इन्तेकाम का है|

उसकी है कोई मजबूरी,
ख़ामोशी में पयाम सा है|

चल किसी नए शहर जहाँ,
नाम अपना गुमनाम सा है|

देर तलक तन्हा सोचना,
रोज़गार हर शाम का है|

घर तो कभी था ही नहीं,
सिर्फ पता मकान का है|

नयी नहीं है कहानी मेरी,
किस्सा ये आम सा है|

किसका ज़मीर है पूरा साफ,
हर कोई थोडा बदनाम सा है|

कोई ख्वाब नहीं बाकी,
जिस्म ये बेजान सा है|

ऐसे ही जिंदा रहना पड़ेगा,
क़र्ज़ उनके अहसान का है|

है जिंदिगी नहीं ये आखरी,
बस नाम एक मकाम का है|

उड़ते नहीं बादलों से ख्याल,
दिल बंद आसमान सा है|

काश होता कोई लफ्ज़ ‘वीर’,
दर्द ये एक गुमनाम सा है|

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