दो कदम

दो कदम हम चले, दो कदम जिंदिगी|

साए से लिपटे हैं, हमराह से,
दो कदम गुम चले दो कदम जिंदिगी|

इंतज़ार है के ख़त्म नहीं होता,
दो कदम कज़ा चले, दो कदम जिंदिगी|

शायर नहीं तू फितरत से ‘वीर’
तुने एहसास लिखे, ग़ज़ल लिखी जिंदिगी|

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