पिंजड़ा छोड़ कर

जाएगा कहाँ पिंजड़ा छोड़ कर,
पाएगा क्या जंजीरें तोड़ कर|

मुश्किलें अब जिस्म बन गईं,
सोजा सुकूं की चादर ओढ़ कर|

नाहक ही ज़ाया किए दिन रात,
पाया क्या तूने सर फोड़ कर|

सीख क्यामत का राज़ साहिब से,
रखते हैं वो करम जोड़ कर|

जिंदिगी टुकड़ों में बिखर गई,
रखा है हर पन्ना मोड़ कर|

खुदी कोई बच्चा तो नहीं,
जगा दोगे इसे झंझोड़ कर|

इसका हासिल किसको पता ‘वीर’,
काट रहे हैं सब उम्र दौड़ कर|

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