बिखरे ख़याल

उस दोस्त के लिए….

इश्क में खुदी को इतना न मिटा,
की भूल जाए रिश्तों को हम,
भुला चुके कई मील के पत्थर,
भुला न दें मंजिल को हम|

उस हसीन के लिए…

नींद तुमको भी आ जाती,
आँखों को हमने भी बंद कर लिया होता,
आज आपने जो पर्दा कर लिया होता..

दिल ऐ बेफिक्र का मौसम युहीं कायम रहता,
आपकी शोखी का सावन अगर सेहरा में न होता …
आज आपने जो पर्दा कर लिया होता|

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खयालों की भीड़ में पुकारा होता, तो बात होती|
दोस्त कहके बुलाते हो, हमराज़ बनाया होता, तो बात होती|

हमसे हमारा हाल न पूछो ‘वीर’,
तुमने भी किसी से दिल लगाया होता, तो बात होती|

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हो सका तो वापस आऊँगा..
खो गया तो गुम जाऊँगा…
उस खंजर पे मेरा नाम लिख दो,
मेरी अमानत है, किसी दिन ले जाऊँगा..

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कुछ तो उन लम्हों में क़ैद है,
के दिल को और कोई आरज़ू नहीं|

एक नींद बिना ख्वाब की भी है,
एक प्यास सैलाब की भी है|
पल पल ख़त्म होता लम्हा,
कुछ ज़ीस्त, क़ज़ा की भी है|

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जिंदिगी की बेरुखी, खुली आँखों की इनायत है,
इस जहाँ में एक ऐसा भी शख्स है,
जिसने ख्वाबों को बंद आँखों से चुराया है|

निकल सकते कुछ अरमान, इतनी तो मैंने पी नहीं,
डूब जाते कुछ सवाल, इतनी तो मैंने पी नहीं|
जो किया अच्छा किया, रो लिया आचा किया|
होता क्यों है अफ़सोस तुझे,
जिंदिगी जी है, पर इतनी तो नहीं|

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कुछ ऐसा केह दिल, की करार आये बेकरारी को,
ख़त्म कर दे ये सिलसिला, या पीजा इस खुमारी को|

तनहाई को कुछ वक़्त तो दो, खुद से दूर जाने को|
दर्द उनसे केहना नहीं, ये काबिल कहाँ, एक अश्क बहाने को|

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कोई आशियाना तेरा भी है,
क्या रखा है बेसबब आवारगी में|

किसका केहना मानेगा ऐ दिल,
वो नहीं तो क्या है जहाँ में|

लेता है हर सितम दिल पे,
शिकवे हैं शायद फितरत में|

थोड़े सपनों की इतनी आरजू क्यों,
बिखरते हैं हर रोज कितने ज़माने में|

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