भूल गए

सजदे तो किये मगर, इबादत भूल गए|
इतने दाना हो गए की शराफत भूल गए|

उसके पहलू में हर शाम आ कर,
हम जिंदिगी की आफत भूल गए|

क्या हो गया है इस जहाँ को दोस्त,
लोग क्यों मोहब्बत भूल गए|

इतना गुरूर है उनको हुस्न पर ‘वीर’,
के शोखी और नज़ाकत भूल गए|

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