मेरे गम मेरे ही रहेंगे

किससे क्या कहें, किससे क्या कहेंगे,
मेरे गम मेरे ही रहेंगे|

कांटे हैं ये ज़हन के बाग के,
हम इन्हें मोतियों से पिरोइंगे|
मेरे गम मेरे ही रहेंगे|

हमदर्दी नहीं हैं चारा इनका,
दोस्त हमें और क्या देंगे|
मेरे गम मेरे ही रहेंगे|

चलते जाना मजबूरी है या फितरत,
सहा है, युहीं और सहेंगे|
मेरे गम मेरे ही रहेंगे|

आज हूँ कल ना होगा मैं,
मेरी जीस्त के फ़साने बनेंगे|
मेरे गम मेरे ही रहेंगे|

उनको और कोई रोज़गार नहीं,
अभी मुझे और बरबाद करेंगे|
मेरे गम मेरे ही रहेंगे|

बेखुदी में, मैं ही बिछड़ गया,
कारवां आगे और बढेंगे|
मेरे गम मेरे ही रहेंगे|

सुनते है वक्त भर देता है ज़क्म,
जहाँ गुजरे इतने साल, और गुजरेंगे|
मेरे गम मेरे ही रहेंगे|

लिपट के रोया उसके दामन में,
इस मरासिम को क्या कहेंगे|
मेरे गम मेरे ही रहेंगे|

अश्क हमराज़ हैं तेरे ‘वीर’,
बेज़ुबां, वो खामोश ही रहंगे|
मेरे गम मेरे ही रहेंगे|

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