सूखे अश्कों के दाग

कल रात यादों से हम इतने आबाद थे,
सुबह तकिये पर सूखे अश्कों के दाग थे|

चादर से ढांक रखी थी हमने हकीकत,
और खुली आँखों के ख्वाब आज़ाद थे|
सुबह तकिये पर सूखे अश्कों के दाग थे…

बस तुम ही समाये थे हर लम्हे में,
तुम ही ख़ामोशी और तुम ही आवाज़ थे|
सुबह तकिये पर सूखे अश्कों के दाग थे….

मेरी दुआओं का इतना ही तो दायरा था,
तूम ही अंजाम और तुम ही आगाज़ थे|
सुबह तकिये पर सूखे अश्कों के दाग थे….

मजबूर रखा वक़्त और किस्मत को,
‘वीर’ हम तो बचपन से ही बरबाद थे|
सुबह तकिये पर सूखे अश्कों के दाग थे….

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