हकीकत

दूं कोई मिसाल, या कोई अफसाना तुमको|
कशमकश में है ये दिल,
दूं ख्वाब तुम्हे, तो दूं हकीकत किसको|

अब सवाल नहीं, के जीके क्या मिला|
बेंच आए खुदको उसी बाज़ार में,
ये सोचो किसको क्या मिला|

मेरे पुर्जे, नज़र आते हैं हर शख्स में,
हर मोड़ पे, मैं खुद अपने से मिला|

अँधेरे कमरे में दिया, कौन जला गया|
इस बच्चे के हाथ में खिलौना, कौन दिला गया|
लौटा जो, आशियाँ आग से खेलता मिला|

वीर,
लफ़्ज़ों में इतनी कशिश कहाँ से होती है,
जो लिखा रगों में दौड़ता मिला|

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