हम ढूँढ़ते हैं

कहाँ चले गए वो कारवां लेकर,
हम रेत पे पैरों की निशां ढूँढ़ते हैं|

सब मशरूफ़ हैं अपनी तलाश में,
हम एक हमदर्द इंसा ढूँढ़ते हैं|

मिलते हैं कितनों से हर दिन,
खुद से मिलने का समां ढूँढ़ते हैं|

है सुकून तेरे ज़हन में ही,
हम इसे कहाँ कहाँ ढूँढ़ते हैं|

मजबूरी है या हौसला इनका,
जहां उम्मीद नहीं,
उम्मीद वहाँ ढूँढ़ते हैं|

जो जज़्बात ना कर सके बयां,
मेरी गज़लों में जुबां ढूँढ़ते हैं|

दीवानापन नहीं तो क्या है ‘वीर’,
लोग वीरानों में सपनों का जहाँ ढूँढ़ते हैं|

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