कहीं खो जाऊँगा

पल में अक्स सा ओझल हो जाऊँगा,
अनजाने ख्वाब सा कहीं खो जाऊँगा|

खलिश भी ना होगी जुदाई की कोई,
तुम्हारे ज़हन में ऐसा बस जाऊँगा|
अनजाने ख्वाब सा कहीं खो जाऊँगा…

हाथों की लकीरों को जब देखोगे कभी,
इनमे कहीं तुम्हे मैं नज़र आऊँगा|
अनजाने ख्वाब सा कहीं खो जाऊँगा…

जब कभी सुनोगे हवाओं की सदा,
खुशबू बनके तुम में सिमट जाऊँगा|
अनजाने ख्वाब सा कहीं खो जाऊँगा…

गम के छलकेंगे अगर कभी अश्क,
तब ख्यालों में तुमसे लिपट जाऊँगा|
अनजाने ख्वाब सा कहीं खो जाऊँगा…

ये भी मेरा सच है मेरे हमनफस,
तुमसे मैं जल्द ही बिछड़ जाऊँगा|
अनजाने ख्वाब सा कहीं खो जाऊँगा…

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हासिल के दायरे

तेरे नाम को हम कब रोते हैं,
हासिल के दायरे बहुत छोटे हैं|

ना रख कोई खलिश दिल में,
ख्वाब आखिर ख्वाब ही होते हैं|
हासिल के दायरे बहुत छोटे हैं…

यही तो दस्तूर है ज़माने का,
मिलकर दिल अक्सर जुदा होते हैं|
हासिल के दायरे बहुत छोटे हैं…

मुन्तज़िर ना छोड़ किसी को ‘वीर’,
तुझसे आवारा कब घर लौटे हैं|
हासिल के दायरे बहुत छोटे हैं…

थोड़ी बेवफाई जायज़ हैं ना ‘वीर’,
यार तो आखिर यार ही होते हैं|
हासिल के दायरे बहुत छोटे हैं…

प्यासा रहता है

कोई सहरा में बूँद ढूँढता है,
कहीं सागर भी प्यासा रहता है|

कहीं चार लम्हें जिंदिगी बन जाते हैं,
कहीं कोई बरसों पल पल मरता है|
कहीं सागर भी प्यासा रहता है…

कभी अश्क पी लेता है छलकने से पहले,
कभी खामोश तन्हा सिसकता रहता है|
कहीं सागर भी प्यासा रहता है…

कहीं लफ्ज़ कह नहीं पाते हैं खलिश,
कोई आँखों से ही सब कहता है|
कहीं सागर भी प्यासा रहता है…

कहीं किस्मत को इलज़ाम मिलते हैं ‘वीर’,
कोई कहीं वक्त सा बहता है|
कहीं सागर भी प्यासा रहता है..

रोने दो मुझे

अपने दामन में खोने दो मुझे,
आज लिपट कर रोने दो मुझे|

बड़ी मुद्दत से पथराई हैं आंखें,
आज देर तलक सोने दो मुझे|
आज लिपट कर रोने दो मुझे…

भागते भागते बिछड़ा खुदसे,
फिर मुझसा होने दो मुझे|
आज लिपट कर रोने दो मुझे…

दिल अपनों के दागों से भरा है,
हर दाग दिल का धोने दो मुझे|
आज लिपट कर रोने दो मुझे…

अब मौत को भी रुसवा करूँ,
सबसे बेखबर सोने दो मुझे|
आज लिपट कर रोने दो मुझे…

खुद की हस्ती का गुलाम है ‘वीर’,
अपनी ज़ुल्फ़ में खोने दो मुझे|
आज लिपट कर रोने दो मुझे…

शब्दों का मदारी

शब्दों का मदारी समझते हो,
ख़ामोशी को वफादारी समझते हो|

रिश्तों में कोई प्यार नहीं है,
इन्हें बस जवाबदारी समझते हो|
शब्दों का मदारी समझते हो…

हाँ सोचता हूँ हर पल तुम्हे,
इसे मेरी बेरोज़गारी समझते हो|
शब्दों का मदारी समझते हो…

बस यूँ ही अनसुना कर देते हो,
या कोई बात हमारी समझते हो|
शब्दों का मदारी समझते हो…

जो हमने कही दिल की बात तुमसे,
क्यों इसे मेरी अदाकारी समझते हो|
शब्दों का मदारी समझते हो…

मेरी बंदगी ही मेरा ईमान है,
इसे किस्मत की लाचारी समझते हो|
शब्दों का मदारी समझते हो…

नादां

ऐसे नादां की हर ठोकर पर गिरते हैं,
फिर भी हम दाना बने फिरते हैं|

कौन मरता है किसी के साथ यहाँ,
कैसे हमदम जाना बने फिरते हैं|
फिर भी हम दाना बने फिरते हैं…

कहने को एक घर है पास लेकिन,
कितने साये वीराना बने फिरते हैं|
फिर भी हम दाना बने फिरते हैं…

जाने क्या ढूँढते हैं गलियों गलियों,
क्यों हम दीवाना बने फिरते हैं|
फिर भी हम दाना बने फिरते हैं…

वक्त भी अजब सौदागर है ‘वीर’,
चंद लम्हे ज़माना बने फिरते हैं|

ज़ख्म

माज़ी के दाग यादों से जाते क्यों नहीं,
मैं तो भुल चला, ये ज़क्म मुझे भुलाते क्यों नहीं|

झटक दूं इन्हें ज़हन से तो साँस मिले,
मार तो दिया है मुझे, ज़ालिम दफनाते क्यों नहीं|

ना अश्क से सींचा, ना ख्यालों की ज़मीन दी,
फिर भी दर्द के ये फूल, मुरझाते क्यों नहीं|

क्या तेरा रूठना गवारा है हसरतों को ‘वीर’,
ख्वाब नए देकर तुझे मनाते क्यों नहीं|

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