तेरे कुछ आंसू

तेरे कुछ आंसू मेरी आँखों से छलक गए,
मेरे दिल में कुछ शोले से भड़क गए|

ना मिला हवाओं का आसरा भी इन्हें,
गम के बादल ज़हन में अटक गए|
तेरे कुछ आंसू मेरी आँखों से छलक गए…

क्यों थामता है उसी का दामन फिर,
जिनकी नज़र को भी तुम तरस गए|
तेरे कुछ आंसू मेरी आँखों से छलक गए…

देख कर घरों की दरारों को ‘वीर’,
हम रास्ते भी तुझ से भटक गए|
तेरे कुछ आंसू मेरी आँखों से छलक गए…

अब सच भी बोलो तो नाप तोलकर ‘वीर’,
तेरे सफ़ेद झूटों से आईने चटक गए|
तेरे कुछ आंसू मेरी आँखों से छलक गए…

सूखे अश्कों के दाग

कल रात यादों से हम इतने आबाद थे,
सुबह तकिये पर सूखे अश्कों के दाग थे|

चादर से ढांक रखी थी हमने हकीकत,
और खुली आँखों के ख्वाब आज़ाद थे|
सुबह तकिये पर सूखे अश्कों के दाग थे…

बस तुम ही समाये थे हर लम्हे में,
तुम ही ख़ामोशी और तुम ही आवाज़ थे|
सुबह तकिये पर सूखे अश्कों के दाग थे….

मेरी दुआओं का इतना ही तो दायरा था,
तूम ही अंजाम और तुम ही आगाज़ थे|
सुबह तकिये पर सूखे अश्कों के दाग थे….

मजबूर रखा वक़्त और किस्मत को,
‘वीर’ हम तो बचपन से ही बरबाद थे|
सुबह तकिये पर सूखे अश्कों के दाग थे….

मंजिलों से रास्ता लेकर

हम भागते रहे मंजिलों से रास्ता लेकर,
वो जुड़ते रहे दिलों में फासला लेकर|

तोड़ कर हमने फिर पहनली जंजीरें,
वो फिर आ गए वही वास्ता लेकर|
हम भागते रहे मंजिलों से रास्ता लेकर…

इन आँखों को अब रंग नहीं दिखते,
बस जमी है एक तस्वीर माजरा लेकर|
हम भागते रहे मंजिलों से रास्ता लेकर…

बीती रात हुआ फिर वही ना ‘वीर’,
रोये हम दीवारों का आसरा लेकर|
हम भागते रहे मंजिलों से रास्ता लेकर…

अब इसे रुसवाई कैसे समझे ‘वीर’,
वो जुदा हुआ होठों पे कुछ कांपता लेकर|

नज़र मिलायें तो मिलायें कैसे

बेरुखी का सबब बतायें तो बतायें कैसे,
तुमसे नज़र मिलायें तो मिलायें कैसे|

कोई शख्स हो तो भुल भी जायें हम,
खुदको खुदसे भुलायें तो भुलायें कैसे|
तुमसे नज़र मिलायें तो मिलायें कैसे…

जिसकी तामीर में उम्र गुज़ार गयी,
उस घर को छोडके जायें तो जायें कैसे|
तुमसे नज़र मिलायें तो मिलायें कैसे…

आँखों में तस्वीर सा है मरासिम जो,
उस तस्वीर को मिटायें तो मिटायें कैसे|
तुमसे नज़र मिलायें तो मिलायें कैसे…

मायूस बच्चे सा दिल बस वहीँ अटका है,
बिना उसके इसे बहलायें तो बहलायें कैसे|
तुमसे नज़र मिलायें तो मिलायें कैसे…

उसने मुह मोड़ लिया अब तुझसे ‘वीर’,
तू ही बता अब उसे मनायें तो मनायें कैसे|
तुमसे नज़र मिलायें तो मिलायें कैसे…

इतनी मोहब्बत थी तुझसे ‘वीर’ हमें,
तेरी लाश को अब जलायें तो जलायें कैसे|
तुमसे नज़र मिलायें तो मिलायें कैसे…

बिछड़ा यार नहीं मिलता

खुदा भी शायद नाराज़ है हमसे,
मिन्नतों से बिछड़ा यार नहीं मिलता|

इसमें कहाँ पहले सी बात रही,
अब शराबों से खुमार नहीं मिलता|
मिन्नतों से बिछड़ा यार नहीं मिलता…

मिलते हैं रिश्ते विरासत में यहाँ,
हर रिश्ते में लेकिन प्यार नहीं मिलता|
मिन्नतों से बिछड़ा यार नहीं मिलता…

मिलती नहीं है मौत से मोहलत कोई,
फिर कोई शख्स क्यों तैयार नहीं मिलता|
मिन्नतों से बिछड़ा यार नहीं मिलता…

कुछ गुलों की किस्मत मुझ जैसी है,
ज़मीन तो मिली मगर गुलज़ार नहीं मिलता|
मिन्नतों से बिछड़ा यार नहीं मिलता…

बहा देना सब गर मिले कोई दामन काबिल,
अश्कों को ये मौका बार बार नहीं मिलता|
मिन्नतों से बिछड़ा यार नहीं मिलता…

क्या शिकायत किजीये किसी से ‘वीर’,
हम आवारों को कहीं दयार नहीं मिलता|
मिन्नतों से बिछड़ा यार नहीं मिलता…

अब लाया है मर्ज़ ए इश्क का इलाज़ ‘वीर’,
जब शहर में उसे कोई बीमार नहीं मिलता|
मिन्नतों से बिछड़ा यार नहीं मिलता…

दुआ में असर रहे

कभी तो दुआ में असर रहे,
कभी तो उसकी हम पर नज़र रहे|

मैं तोड़ दूंगा सारी बंदिशें सनम,
तुझमें साथ चलने का जिगर रहे|
कभी तो दुआ में असर रहे…

बेखुदी उलझा ले चाहे जितना,
तुम्हे जिंदिगी की तो कदर रहे|
कभी तो दुआ में असर रहे…

पत्थर पर्वत नदी हो या तूफ़ान,
बस चलते जाने का हुनर रहे|
कभी तो दुआ में असर रहे…

आवारगी जब भी करे गुमराह,
घर तक जाती कोई डगर रहे|
कभी तो दुआ में असर रहे…

प्यार भी होता मौत सा अगर,
हर वक्त बस मुयास्सर रहे|
कभी तो दुआ में असर रहे…

उन्ही लहरों से डूबे तुम ‘वीर’,
जिनसे खेलते तुम अक्सर रहे|
कभी तो दुआ में असर रहे…

ना सुध है ज़माने की ना सही,
खुदको खुदकी तो खबर रहे|
कभी तो दुआ में असर रहे…

पथरीले रास्तों से क्या डरना,
बात कुछ और गर हमसफ़र रहे|
कभी तो दुआ में असर रहे…

सब हासिल कितना बेरंग होगा,
कुछ तो जिंदिगी में कसर रहे|
कभी तो दुआ में असर रहे…

गर ना रहे मेहकता प्यार से,
घर में सुकून की तो बसर रहे|
कभी तो दुआ में असर रहे…

यही मुनासिब है आदमी के लिए,
अपनी राह पर सर बसर रहे|
कभी तो दुआ में असर रहे…

जो नहीं तेरे दिल में आशियाँ,
बता दे अब ‘वीर’ किधर रहे|
कभी तो दुआ में असर रहे…

जवां हो जाने की

अहिस्ता रख ज़ख्मों पर हाथ सनम,
इनकी तासीर है जवां हो जाने की|

शमा-ए-मोहब्बत ना रहेगी उम्र भर,
इसकी किस्मत है धुआं हो जाने की|
इनकी तासीर है जवां हो जाने की..

हर वक्त क्या ढूँढता है लोगों में तू,
तुझे बिमारी है गुमां हो जाने की|
इनकी तासीर है जवां हो जाने की…

मत कर महसूस इतना हर बात को ‘वीर’,
गिलों की आदत है जमा हो जाने की|
इनकी तासीर है जवां हो जाने की…

कौन कब तलक संभालेगा तुझे ‘वीर’,
तेरी फितरत ही है फना हो जाने की|
इनकी तासीर है जवां हो जाने की…

%d bloggers like this: